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बा (काव्यांश- ९)

बा (काव्यांश- ९)

दीनानाथ पोख्रेल : ज्ञाता हो भव ज्योतितुल्य मन त्यो अल्पेर टाढा हुँदा सारा देह भिज्यो परी

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